बेकल ,बेचैन, गुमनाम सा कोई है ,
जो मुझ में तुझ में और हम सभी में हैं।
चाहता है जो मिल जाए एक पहचान ,
जाने मुझे सभी लोग सिर्फ नाम से मेरे।
प्यासी फिरी पहचान की मदिरा की खातिर ,
ताउम्र
भटकी अस्तित्व की खोज में,
ज्ञान का जो तीसरा फिर नेत्र खुल गया ,
भगवान के जो ध्यान में तन मन यह हो गया ,
सारी पहचाने होने पाने का दुख तमाम खो गया।
निमिषा सिंघल