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इंतेहां

तेरे इश्क की इंतेहां चाहता हूं,
बड़ी मुद्दत हुवी बिछड़े तुझसे,
अब मिला है तो राह-ए-सफ़र में,
तुझसे फिर रूबरू होना चाहता हूँ।

ता उमर देता रहा फरेब खुद को,
मोहब्बत की राह मैं,
लुट ता रहा मैं
इश्क के हाथो सारे बाज़ार में।

खाई है हमने चोट दिल पे,रहे इश्क में
मैं भी कितना नादान हूँ,
ये मैं कॅया चाहता हूँ,
तुझसे फिर दिल लगाना चाहता हूँ,

कर के एक बेवफ़ा से वफ़ा की उम्मीद,
उसे वफ़ा चाहता हूँ।

By-M.A.K

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