Site icon Saavan

ईश्क़

वो अक्सर गुम रहती है ख़्यालों में,
उसके वो ख़्याल हो जाने के ख़्वाब बुनता हूँ मैं।

वो आँखों से बातें करती है,
मैं अपनी आँखों से चुनता हूँ उन्हें।

उसे श्रृंगार करना पसंद है,
मुझे देखना उसे श्रृंगार करते हुए।

वो अक्सर ईश्क़ लिखती है कविताओं में,
मुझे उससे उतना ही ईश्क़ है,
जितना उसे अपनी कविताओं से।

Exit mobile version