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“उतरन”

“रिश्तों में वफादारी और विश्वास”
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गमों की बरसात होती रही
अश्क रुखसार पर लुढ़कते रहे,
हमने सोंचा ये फिक्र है तुम्हारी
यही सोंचकर हम
हर सितम सहते रहे….
एक सिसकती हुई रात ने
समझा दिया हमको
जब तुम लिपटे हुए थे
गैरों की बांहों में
हमें वफादारी का पाठ पढ़ाने वाले
खुद बैठे थे किसी महबूब की.पनाहों में,
सब कुछ सह रहे थे हम,
पर ये कैसे सह लेते हम !
रोटियां टुकड़ों में मुनासिब थीं पर
पति का प्यार कैसे बांट लेते हम !
वो सिर्फ हमारे हैं यही सोंचकर
सह रहे थे सभी जुल्मोंसितम,
पर ‘प्यार की उतरन’ कैसे स्वीकार करते हम
वो गलियां छोंड़ आये हम….

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