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कहां आज घूम हूं

तो कहा आज घूम हूं
साए के खुदसे मैं
चुप्ता क्यु घुम हू मैं
ये झूठी लकीरें लेकर चल रहा
बेफिजूल की जिंदगी जी राह
भाग क्यों रहा हूं मैं
उस शख्स से उस वक्त से
उस सत्य से उस तथ्य से
जो होना है वो हो रहा
फिर चुप्ता क्यु मैं फिर रहा
उगलने मुझको सच
हैं उगलने मुझको दर्द
निकल गया मैं… निकल गया मैं
लेने दुनिया से थोड़ा कर्ज

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