शब्दों का भंडार लिए
ज्ञान का प्रकाश लिए
हर घर आंगन दिखती है
जीवन का सारांश लिए।
यूँ तो रहती मौन है
फिर भी बहुत वाचाल है
नेत्रहीन है स्वयं में लेकिन
सबको दिखाती संसार है।
इसके ही चार आखर पढ़कर
दुनिया बनती विद्वान है
चाहें हो कोई भी ईमान धर्म फिर
दिलाती सबको सम्मान है।।