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कोयल

नगर कुमारी देख कर बोली
करूप है कोयल काली
मेरे उपवन आकर लजाए
बैठी कदंब की डाली
मैं सुर के सिंगार से सजती
भले रंग मेरा काला
अभूषण के सिंगार सजे तू
पहन वैजयंती माला
तारे पृथ्वी यह सारा
ब्रह्मांड है काले रंग में
चांद से मुख पर रीझ रही तू
घूमे है कितने घमंड में
नगरधीश है पिता तो रीझे
खोल के चलती केष
ऐसे नगर मेरे पांव तले हैं
रोज मूलांघू प्रदेश
तू महलों की कोठरी में बंद
मेरा भवन प्रकृति
नील सरोवर बनाके दर्पण
देखकर रोज सवरती
तू क्या सोचे तू ही सुंदर
मैं लगती तुझे करूप
कोई तो युक्ति लगा बदल लूं
मैं भी अपना रूप
नगर कुमारी ऐसे चमके
जैसे हरि का शंख
मैं भी चांद की धूल मरूंगी
करूंगी दूर य काला कलंक

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