किसने सोचा था
कि एक दिन
खुली हवा में सांस लेना
किसी शोहरत से कम न होगा
इस फिज़ा में यूँ
मर्ज़-ए-दिल ये इश्क नहीं
ज़हर घुला होगा…
कोरोना- इन्सानों का पिंजरा


किसने सोचा था
कि एक दिन
खुली हवा में सांस लेना
किसी शोहरत से कम न होगा
इस फिज़ा में यूँ
मर्ज़-ए-दिल ये इश्क नहीं
ज़हर घुला होगा…