जाग उठ जा, अब पथिक
पूरा सवेरा हो गया है,
देख ले खिड़की से बाहर
सब अंधेरा खो गया है।
क्या पता क्या थी कशमकश
नभ-धरा के बीच में
रात भर का प्रेम रण वह
ओस बूंदें बो गया है। ।
जाग उठ जा, अब पथिक
पूरा सवेरा हो गया है,
देख ले खिड़की से बाहर
सब अंधेरा खो गया है।
क्या पता क्या थी कशमकश
नभ-धरा के बीच में
रात भर का प्रेम रण वह
ओस बूंदें बो गया है। ।