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जिंदगी

जिंदगी की तेज रफ्तार गाड़ी ,
बिना रुके चलती चली जाती है।
दुख सुख के स्टेशनों पर ,
नहीं एक क्षण भी गवाती हैं।
जब देख खुशी थमना चाहा ,
दुख देख वहां से भागना चाहा ,
रफ्तार ना अपनी बदली तक,
यूं ही चलती रही आगे ब ढ़ चढ़ ।
सुनकर भी हाहाकारों को
सुनकर खुशी के नगाडों को
पलके गीली तो करती है
होंठो पे हंसी भी खिलती है।
आंखों कानों पे हाथ धरे
वो दौडी_ दोडी जाती है।
आवाज़ें दे थक जाते हम
पीछे दौड़ नहीं जा पाते हम।
जब रुक जाती सांसे अपनी,
तब ठहरती है ये जिन्दगी।
निमिषा सिंघल

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