जब दुःशासन खींच रहा था,
द्रुपद सुता की साड़ी।
शीश झुकाए सब पांडव थे
विलख रही थी नारी।।
विलख रही थी नारी
धर्म धुरंधर भी थे मौन।
युद्ध हुआ महाभारत का
जिम्मेवार हुआ फिर कौन।।
जब दुःशासन खींच रहा था,
द्रुपद सुता की साड़ी।
शीश झुकाए सब पांडव थे
विलख रही थी नारी।।
विलख रही थी नारी
धर्म धुरंधर भी थे मौन।
युद्ध हुआ महाभारत का
जिम्मेवार हुआ फिर कौन।।