Site icon Saavan

धर्म के निकेतन

एक पीड़ है हृदय में
एक दर्द है भयंकर।
तड़प रही है धरती
और रो रहा है अंबर।।
जिसने मुझे है लूटा
ज़िन्दगी बनाई बदतर।
कहता मुझे लुटेरा
आखिर बताओ क्योंकर।।
मेहमाॅ बानाके जिसको
रखा था घर में अपने।
मालिक -सा वो बनकर
घर को लगे हड़पने।।
कुछ तो करो ‘विनयचंद ‘
भगवान से निवेदन।
इंसान से भरा हो
ये धर्म के निकेतन।।

Exit mobile version