हम अभिभावकों के लिए यह कहाँ तक संभव है
हर जगह बेटियों के साथ, परछाई बन चल पाना
क्या यह उचित होगा, फिर से
घर की चाहरदीवारी में, रोक पाना
हथरस जैसी घटनाएँ, नितप्रतिदिन डरा रही है
हमारी नन्ही सी जान, लगी है निशाने पर ।।
हम अभिभावकों के लिए यह कहाँ तक संभव है
हर जगह बेटियों के साथ, परछाई बन चल पाना
क्या यह उचित होगा, फिर से
घर की चाहरदीवारी में, रोक पाना
हथरस जैसी घटनाएँ, नितप्रतिदिन डरा रही है
हमारी नन्ही सी जान, लगी है निशाने पर ।।