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पलायन

गांव वीरान हो गए
छोड़कर वे मनोरम वादियां
शहर की ओर चल दिये,
फिर नहीं लौट पाये वापस
शहर में भीड़ थी
वे भीड़ में समा गये।
उधर वे खो गए
इधर गांव के आंगन के
पत्थर तक रो दिए।
खेत-खलिहान
में झाड़ियां उग गईं,
उनकी यादें धीरे-धीरे मिट गईं।

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