Site icon Saavan

पहचान

अगर मैं होती गरीब किसान की उपजाऊ भूमि
बंजर होने पर जरूर दुत्कार दी जाती

मैं होती कुमार के चाक मिट्टी
उसी के दिए आकार में ढल जाती

मैं होती माली के बाग का फूल
मुरझाने के लिए गुलदस्ते में छोड़ दी जाती

मैं होती किसी महल की राजकुमारी
विवाह के बाद छोड़ उसे मै आती

कहने को तो होती मै लक्ष्मी घर की
पर अलमारी के लॉकर की चाबी बनकर रह जाती

चाहे चिल्लाऊं मै खूब जोर से
फिर भी मन की व्यथा ना कह पाती

चाहे मैं होती किसी जज का हथोड़ा
फिर भी मेरी पहचान ना होती

बनाती फिर भी रसोई में रोटी
सोचती काश ! कोई मेरी भी कोई पहचान होती….

Exit mobile version