पपीहे का ज़ुनून देखो, नहीं छोड़ता आस।
बारीश की पहली बूंद से ही बुझाता प्यास।
चींटी दोगुना बोझ लाद, चढ़ती ऊंचाई पर,
गिरती बारम्बार वो, पर करती पुनः प्रयास।
वफादारी आज इंसानों में दिखाई नहीं देती,
नि:संदेह ही श्वान पर, कर सकते हैं विश्वास।
दरिया के रफ्तार को रोकना, है नामुमकिन,
आगे बढ़ना प्रकृति है, चट्टान को भी तराश।
छांव, फल, आश्रय करती नि:स्वार्थ प्रदान,
पेड़ों के बगैर पृथ्वी का निश्चित है विनाश।
देवेश साखरे ‘देव’