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प्रेम

उनसे मिलना कुछ वैसा भी खास ना था
वो तो शायद देख रहे थे मुझे किसी खिड़की से
मैं तो सिर झुकाये बैठा था किसी कोने में
तुझे बिना देखे भी जो बात वैसा उनमें रास ना था

सांसे चलती रहेंगी मगर दम घुटता हुआ सा लगेगा
नब्ज़ चल रहे होंगे मगर धड़कन रुक सी गयी होगी
अजीब सी तड़प है इस प्यार में
जान जाती रहेगी मगर हिम्मत वो करता रहेगा
शरीर सिकुड़ चुका होगा मगर उसे देखने की चाह में आँखे खुली रहेंगी

लब्ज़ थक जाये मगर बातें खत्म ना हों
उँगलिया सूझ जाये मगर ये लिखना बंद ना हों
तेरे लिए अब क्या हीं कहूँ जी
ये नब्ज़ थम जाये मगर ये धड़कन तेरे नहीं तो किसी की ना हों |

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