जिस्म के बाजारों में
इंसानियत बिका करती है
मौजकी के आड़ में हैवानियत
की मेहफ़िले सजा करती है
दाम यहाँ शरीर का नहीं
स्वाभिमान का लगाया जाता है
इसी बाजार में न जाने कितने
रिश्तो की आग जला करती है
तू खरीद सकता है
जीत नहीं सकता
तू इज्जत बैच सकता है
फिर कमा नहीं सकता
यह बाजार ही मानवता का है जनाब
तू रिश्ते बना सकता है
पर निभा नहीं सकता