मसला सिर्फ इतना है
वो समझते नहीं मुझे
गर समझते तो इक नया
मसला खड़ा होता
ठीक से नहीं समझते
इस ठीक से समझने की
कोई परिभाषा नहीं है
अंदर से तालमेल की
कोई अभिलाषा नहीं है
उम्र गुजर जाती समझने में
जीने के लिए उम्र
कोई उधार नहीं देता
कुछ लम्हे इक दूजे से
उधार लिए थे
जिसका सूद न तुम चूका पाये
न मैं चूका पाया
बस बढ़ता जा रहा है सूद
काश फासलों में
कुछ तालमेल होता
छोटी छोटी बातों में
जीवन का खेल होता
मसला सिर्फ इतना है
राजेश’अरमान’