यशोदा पूछ रही कान्हा से,
“लल्ला, मटकी से रोज़ – रोज़ माखन कौन चुराता है”।
लाड लड़ा के बोले कान्हा, डाल के गलबैयां मां के,
” मैं क्या जानूं , मैं हूं नन्हा बालक ,तू मेरी प्यारी माता है”।
मां बोली,” रहने दे कान्हा, हर दिन तेरा ही उलाहना आता है”
बलराम से पूछूंगी मैं, वो जो तेरा भ्राता है।
“ना मैया ना, बलराम तो झूठा है, वो कितना मुझे सताता है”
ये सब सुन के मैया मुस्काई,
माखन की मटकी एक कोने में रखवाई।
यशोदा की ज़रा देर आंख लग आई,
खटर – पटर सुन के मैया दौड़ के आई
माखन खाते पकड़े गए कन्हाई।
कान खींच के बोली मैया,”पकड़ी गई तेरी चतुराई” ।
कान्हा बोले________
” मारो ना मैया, मैं चाराऊंगा गैया,
सखाओं के लिए ले जाता हूं माखन,
मिलते हैं मुझे वो जमना के तीरे, कदम्ब की छैयां।
सखा मेरे भूखे हैं तो क्या पेट ना भरूंगा
तू भी ना रोक मैया, ऐसा तो में करूंगा”
यशोदा अपने लाल पे वारी- वारी जाए,
कान्हा तेरे गुण सदा ही ये जग गाए।