Poetry on Picture Contest

एक दिन (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

वतन फ़रामोश तेरा अंतिम घड़ी एक दिन आएगा। तेरी चौड़ी छाती पे देखना, हमारा तिरंगा फहराएगा।। बहुत सह लिए तेरा जुर्म एक दिन फैसला हो जाएगा। सुभाष भगत आज़ाद की दास्तान मेरा पंजा बताएगा।। फौलादी दिल में एक दिन देखना शोला ले लेगा जन्म । तिरंगा की कसम आज नहीं तो कल फैसला हो जाएगा।। »

दहाड़

ज्यों पले इक मां की गोद में, नन्ही सी जान। त्यों पले तू भारत की गोद में, पाकिस्तान। समुद्र है हिंदुस्तान मेरा, लहरें हैं विशाल। एक लहर भी क्रोधित हो तो, तू हो जाए बेहाल। तिनके को भी तरसेगा, भूख से होकर व्याकुल। दर दर तू भटकेगा , प्यास से होकर पागल। ले छीन लिया वो हक हमने, जो तुझे देके गलती की थी। इस बूंद बूंद पानी की कीमत तूने ना पहचानी, अब भूखा प्यासा फिरेगा तू, हम हैं जिद्दी हिन्दुस्तानी। बहुत ह... »

चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर

लेके काँधे पे बन्दूक दिल में देशप्रेम अटूट चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर। न हीं जीवन की मोह न हीं परिजन बिछोह देश के खातिर दिया सब कुछ है छोड़। चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।। ये हमारे वीर सिपाही लड़ने में न करे कोताही जलती धरती अंबर बरसे घनघोर। चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।। नहीं किसी से वैर है न अपना कोई गैर है भारत माँ की रक्षा में है न कोई थोड़। चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।। विस्तार... »

भारत चीन तकरार

करारा जवाब मिलेगा, अभिनंदन अपने पास होगा जब पाकिस्तान का बात होगा, 56″ इंच का साथ होगा, युद्ध जब चीन से होगा, जवानों का बलिदान होगा, फिर भी उसका अभिमान होगा, राजा रानी में तकरार होगा, तब देश का बात होगा. »

सैनिक

प्रिय सैनिक, जो तुम हो तैनात सीमाओं पर, तो हम हैं निश्चिंत घरों घर। है तुम्हारी रडार सी पैनी नजर , तो हमारे नैनो में बसता है सुकुं प्रति पहर। तुम निभाते हो ड्यूटी अति कठोर, तो हम हो जाते हैं चिंता मुक्त हर ठौर। इस चित्र कविता कांटेस्ट से है प्रेषित, हमारा कोटि कोटि नमन तुम्हारी ओर। »

इम्तहान की घड़ी

उठा के बंदूक हाथ में, ए वीर तुम अब बढ़े चलो। जान हथेली पे रख के, अपना कर्तव्य निभाते चलो।। इस देश को तुम्हारे जैसे ही, सपूतों की जरुरत है। जंग की घड़ी आई है, सिर पे कफ़न बांधते चलो।। ए सपूतों कोई धर्म वीर बनो, तो कोई कर्म वीर बनो । धर्म कर्म के औजार से, दुश्मनों को अंत करते चलो। »

घोड़ा दबा दे सिपाही

कविता – घोड़ा दबा दे सिपाही तीखी नजर से सिपाही आज ऐसा निशाना लगा दे, मार दे देश के दुश्मनों को उनका नामोनिशां तू मिटा दे। तूने सीमा में डटकर हमेशा दुश्मनों के छुड़ाये हैं छक्के, आज गलवान घाटी में तूने दुश्मनों को लगाये हैं मुक्के। तेरे मुक्के से दुश्मन पिटेगा तेरी गोली से दुश्मन मरेगा, हिन्द की जय हो जय हो हमेशा तेरी बन्दूक का स्वर कहेगा। तेरी नजर लक्ष्य पर है सामने फौज दुश्मन खड़ी है, अब तू घो... »

जागो हे भरतवंशी

जागो हे भरतवंशी अलसाने की बेर नहीं । सहा सबकी साज़िशों को,करना है अब देर नहीं ।। शालीनता की जिनको कदर नहीं,विष के दाँत छिपाये है मौकापरस्त फितरत है जिनके,क्यू उनसे हम घबराये है फ़ौलाद बन उत्तर दो इनको,पंचशील की बेर नहीं जागो हे भरत—— सामने शत्रु है वो,वृतासुर सी प्रवृत्ति जिनकी रही है हिन्द के सह से वीटो की छङी,जिनके हाथों में पङी है दधीची बन, भेद उनको,बुद्ध की अभी दरकार नहीं जागो हे भ... »

ये रणबांकुरे भारत के

ये रणबांकुरे भारत के,सीमा पर देखो खड़े हैं हम चैन से सोएं रातों को, दुश्मन से वो लड़े हैं गर्मी का मौसम हो,या पड़े कड़कती सर्दी भारत मां की रक्षा करते ,पहन के फौजी वर्दी याद आती है घर की मगर,फिर भी इन्हें सुहाती ये डगर अड़ियल है दुश्मन, बर्फीली वादी खाने को मिलती है, अक्सर रोटी सादी देशभक्ति मन में लिए,सरहद पर सैनिक खड़े हैं दिल से नमन है उन वीरों को, भारत मां की रक्षा खातिर, जो बैरी से लड़े हैं »

कविता

तुम रहे हमेशा आगे ऐसे तूफान भी न छू पाए तुम्हारे देश के एक- एक कण को……. कोई अपना बनाकर न ले जाए….. जान हथेली पर लेकर तुम चीर लाते हो दुश्मन की आंख….. तुम ढाल बने रहे ऐसे कि शत्रु भी तुमसे कांप जाते….. अपनी करूणा की चादर को छोड़ तुम वतन की रक्षा में लौट आते …… तुम हृदय के सभी रिश्तों को एक चुनौती दे आते… रिश्तों के इन एहसासों में एक राष्ट्रपूत प्राण ह... »

विश्व समर जीत

जाग हे पार्थ जाग तू, दे काल को अब मात तू, काल के कपाल पर अमिट रेखाएं खींच, अब तू काल समर जीत। स्वयं के सम्मान हेतु , विश्व के कल्याण हेतु , अपने अंदर के ज्वाल पुष्प को तू सींच, अब तो दिव्य समर जीत , अब तो विश्व समर जीत ।। हो रही हूंकार है , उठ रही तलवार है, गांडीव के बाण से , विश्व के इतिहास में , गाथा नवीन लिख। उड़ उड़ान बाज की , हुंकार हो वनराज की, हर संकट में बने कठिनाई तेरी मीत, अब तू धर्म समर... »

किसने बनाई ये सरहदें??

सरहद की ये आड़ी-तिरछी लकीरें, किसने खिंची क्या पता! गर जो वो तुमको मिले, मुझे भी उसका पता देना!! बस पुछुंगी इतना ही, एकता ना तुमको भायी! सीमांत बना कर क्या मिला, इंसानो से ऐसी भी क्या थी रूसवाई!! पंछी, नदियां,रेतें,पवन, उन्मुक्त से बहे तो कौन इनको रोक पाता! इनमें ना कोई मजहब,जात ना पात, ना कोई सीमा जो रोके इनका रास्ता!! ये तो लगता जैसे, कुछ-कुछ भाईयों का बंटवारा! कुछ जमीन, तुम रखो कुछ हमारा!! लडें... »

करिश्मा अपने वतन के

मेरा आन वतन, मेरा बान वतन, मेरा शान वतन। गैरो में दम कहाँ जो करे, हमारे वतन को पतन।। अनेक आए अनेक गए, बाल न बांका कर सका। मेरा भारत भारत ही रहा, कोई न इसे झुका सका।। मशाल ले कर जंग में कूदना, यही हमारी करामाती है । वतन पे हो जाएं हँस के कुर्बान, यही हमारी शरारती है ।। कहे कवि- दुश्मनो ने राहों में कांटे ही कांटे बिछा दिए। हम कांटे को सिंच कर नेहरू के लिए गुलाब बना दिए।। »

हे कर्मवीर हे धर्मवीर

हे कर्मवीर हे धर्मवीर हे परमवीर तुम शौर्य महान, हेभारत मा के वीर सपूत इस देश के लिए कुर्बान है जान बलिदान तेरा न व्यर्थ जाएगा तेरा लहू इस देश के काम आएगा न झुकने देंगे हम शीश चमन का तिरंगा यह हर पल गगन में लहराएगा याद रखेंगे सदियों तक तेरा यह अमूल्य बलिदान हे कर्मवीर हे धर्मवीर हे परमवीर तुम शौर्य महान मैं भी चलूं उसी पथ पर जिस पथ पर लाखों वीर गए मिट गए देश पर हंसते हंसते जंग लड़ने जो रणधीर गए वीर... »

Vo foji h hm

Vo foji h hm Bharat jinki mata h Jiske vo rakshak h Din ho ya raat kdhe rhthe h jo Grmi ho ya thnd mdhe rhthe h jo Vo foji h hm Desh ki krte rksha h jo Desh ke liye khun bhathe h jo Desh ke aage family bhi nhi dikthi jinhe Desh ke liye sda lete h shapth Vo foji h hm Desh me hota bura sluk h jiska Desh me aate hi khun ho jata h jinka Apne hi sath chod dete h jiske Kuch rupyo ke liye bhula dete h ri... »

हम सिपाही है….. सिपाही ही रहेंगे…..

….हर तरफ़ एक शोर है…..हर तरफ़ एक ही बात, मुल्क़ के लिए अपनी जान जो दे गए, यथासंभव हमें देना हैं मिलकर उनके परिवार का साथ….. जोड़ सकते है हम अगर एक लहर को तो जोड़ेंगे दिन और चाहे रात, वापिस तो नहीं ला सकते अपने शहीदों को पर मिटा भी नहीं सकते उनके अपनो के दर्द भरे जज़्बात….. हमारे लिए वो लड़े जिनके वो बैरी नहीं टुकड़ों में बिखर गया अब उनका शरीर , बिखरे है वो कहीं कहीं, मुल्क अपना है ... »

ललकार

देखो चली नौजवानो की टोली। खेलेंगे लाल फिर लहू की होली।। चारो दिशाओं में गूंज रहा है। इंक़िलाब जिंदाबाद की बोली।। अग्निपथ पे चल पड़े है सपूत। ललकारे छोड़ के आसमां में गोली।। »

जागो

आज फिर ए वीर, इम्तहान की घडी आई है। जागो ए सपूत, माँ फिर बेटा कह के बुलाई है।। उठा के बंदूक हाथ में शरहद के तरफ चलना है। माँ के कर्ज चुकाने का यही शुभ अवसर आया हैं।। देश द्रोही आज फिर ,मुद्दत बाद माँ पे उंगलि उठाई है। हमारे सुख चैन में फिर काली ग्रहण दुश्मन ने लगाई है।। »

हम वो पागल प्रेमी हैं जो मातृभूमि पर मरते हैं ।

न पायल पर, न काजल पर न पुष्प वेणी पर मरते हैं हम वो पागल प्रेमी हैं जो मातृभूमि पर मरते हैं । सियाचिन की ठंड में हम मुस्तैद है बन इमारत माँ सरहद की रेत पर हमने लहू से लिखा भारत माँ हमें डिगा दे हमें डरा दे कहाँ है हिम्मत बिजली की नहीं चाह है फुलवारी की नहीं तमन्ना तितली की नहीं गुलाब , केसर ,चम्पा हम नाग फनी पर मरते हैं हम वो पागल प्रेमी हैं जो मातृभूमि पर मरते हैं । हम तो वो रंगरसिया हैं जो खेले ... »

सोचता हूँ….

सोचता हूँ, क्यों ये बंदूकें है तनी? उन जीवों पर जो दिखते हूबहू हम जैसे, नेताओं के कठपुतले बन, मात्र खून के कतरे है बहे। सोचता हूँ जब माता-पिता के विषय में, आँखों से मन के भाव झलक पड़े। “हमारा आशीर्वाद है, लौट तुम्हे आना है” बस यही शब्द याद रहे। सोचता हूँ जब प्यारी बहन के बारे में, जिसकी डोली मुझे उठानी है, उसकी खुशियों में अपनेपन की मिठास मुझें मिलानी है। सोचता हूँ जब उन प्यारे नन्हें ह... »

आठवें वचन के साथ, गृहस्थ को अपनाता हैं…

छोटी-सी ज़िंदगी में, हर कोई अपने सपनें सजाता हैं। विवाह तो सभी करते हैं… वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं। मात-पिता की सेवा को जो, भार्या घर छोड़े जाता हैं.. खुद ‘भारत मॉं’ की रक्षा का बेड़ा उठाए सीमा को तैनात होता हैं। वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं। हमें अपना परिवार देखें बिना रहा न जाता हैं.. बच्चे कब बड़े हुए, बहना कब सयानी हुई, उ... »

आज़ादी

लगा के निशाना दुश्मन पे, अपनी ताक़त दिखा देंगे। ज़ुल्म के सिन्हा चीर कर, वतन को आज़ाद कर देंगे।। »

जंग

सिर पे कफ़न बांध चले हम, ईट के जवाब पत्थर से देने। देखे किस में कितना है दम, चले बस हम यही आजमाने।। »

वंदेमातरम

मां तुझ से है मेरी यही इल्तज़ा। तेरी खिदमत में निकले मेरी जां। तेरे कदमों में दुश्मनों का सर होगा, गुस्ताख़ी की उनको देंगे ऐसी सजा। गर उठा कर देखेगा नजर इधर, रूह तक कांपेगी देख उनकी कज़ा। कभी बाज नहीं आते ये बेगैरत, हर बार शिकस्त का चखकर मज़ा। दुश्मन थर – थर कांपेगा डर से, वंदे मातरम गूंजे जब सारी फिज़ा। देवेश साखरे ‘देव’ »

दम

जब जब ज़ुल्म कीआंधी हमारे देश में आयी। तब तब हम प्रहरी अपने देश की लाज बचायी।। निशाना हमारा चूक जाए ऐसा कभी हुआ नहीं। गर निकल गयी गोली तो समझ ले तेरी खैर नही।। आए हैं सिर पे कफन बांध कर छक्के छुड़ायेंगे हम। हम किस मिट्टी के बने है आज तुझे बतायेंगे हम।। डरा दे हमें किसी माई के लाल में इतना दम कहाँ। विजयी पताका गाड़ेंगे हम शहीदों के कब्र है जहाँ।। »

हिन्दुस्तानी फौजी

बदन पर लिपट कर उस घड़ी तिरंगा भी रोया होगा जब उसने अपने हिन्दुस्तानी फौजी को खोया होगा। माँ की छाती में भी दूध उतर आया होगा जब उसने अपने शहीद बेटे को गोद में उठाया होगा। »

‘जंग का ऐलान’

जंग का ऐलान हम नहीं करते, पर जंग छिड़ जाने पर पीछे नहीं हटते। यही तो है हम हिन्दुस्तानियों का हुनर, सिर कटा सकते हैं पर झुका नहीं सकते। आखरी साँस तक लड़ते हैं हम फौजी देश के लिए, शहीद हो जाते हैं पर हिम्मत हार नहीं सकते। हारना तो हमको आता ही नहीं है और, कभी दहशतगर्द हम पर विजय पा नहीं सकते। मिट जाते हैं हँसते हुए हम अपने देश के लिए, पर कभी दुश्मन को पीठ दिखा नहीं सकते। हम दुश्मन को खदेड़ आते हैं उसकी... »

नारी शक्ति

मैं पुत्र उस नारी की जिनकी आंखों में पीड़ा देखी , उजागर करता हूं उन पीड़ा का……….। जनमानस से भरा जिसने धरती को , घर के कोनों में मजबूर हुई जीने को। दुर्गा, काली के रूप में पूजा जिनको  , शर्मसार किया उनको । सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारंभिक बीज है वो , फिर भी गोद में कुचला उनको। नए – नए रिश्ते को बनाने वाली रीत है वो, हमने हर रिश्तो में नीचा दिखाया उनको। उसने हममें कोई फर्क नही... »

जूनून – काश सपने मैं जी लू

बेवजह ख्वाब को हम जिए जा रहे हैं हकीकत को धोखा दिए जा रहे हैं पता है मयस्सर, न होंगी ये ख्वाहिश मगर कोशिशें हम, किए जा रहे हैं मिली मुफ्त में है, ये नींदे ये ख्वाहिश अगर टूटी ख्वाहिश, बेशक न रोना है खुलेगी जब आंखें, जनाब सामना हकीकत से ही होना है ✍️स्वरचित कविता-प्रिया वर्मा »

कविता (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

झांक हमारे अंदर लहू है, पानी नहीं। आज़मा कर देख, हम किसी से कम नहीं क्यों इतराता है, तू अपनी ताक़त पे। गर आज हम नहीं, तो कल तू भी नहीं।। अपना हक़, सिन्हा चीर कर ले लेंगे हम। झुका दे मुझे , तुझ में इतना दम नहीं।। गर गिर गये हम तो, संभलना जानते हैं। हम से है जमाना , जमाने से हम नहीं।। यही मिट्टी मांगा था , कभी लाल लहू। लहू से सिंचे है भारत को, पानी से नहीं।। मेरे वतन पे, बुरी नज़र रखने वाले। धूल न च... »

Photo par kavita

Ye tasveer suna rahi h, darde manjar ki kahani is tarah Na jane ab vaapas aana ho kab Is shahar, is gali, aur is jagah Tune o corona kya kar dala Kaam chhina, sukh- sukun chhina Aatamvishwas ki bhi dhhaziyan uda dali Ab rha gaye hum ghar, baar, bhojan bina Jhankti si ye aankhen ,lakho sawaal smate h Galti passport ki, rashan card ne jheli h Arre, kuch bacchhe anath hue, kai log baiaulad hue Dekhte... »

प्रवासी की पीड़ा

भारतवासी बना प्रवासी, कैसा किस्मत का खेल है मजदूरों की भीड़ से भरी, यह भारतीय रेल है घर जाने की जल्दी में, मची ये रेलमपेल है भाग रहे गृह राज्यों में ये, जैसे यहां कोई जेल है ना ही खाना ना ही छत है, भागना ही इक रास्ता है लाकडाउन ने कर दी सबकी, हालत बड़ी खस्ता है मरे भूख से या कॉविड से, डर नहीं बिल्कुल लगता है बस अपनो के बीच कैसे भी, पहुंचे उसकी चेष्टा है सरकारों की मजबूरी है, मानवता शर्मिन्दा है जि... »

भारती की अथहा पीड़ा

क्षणभर में क्षीण हो छलकी आंख भारत मां की जब मजदूरों के छाले सीने में लेकर बैठ गई निज संतान का दर्द दिखा तो ऐसी दर्द की आह,,,,, भरे जैसे लोह पथ गामिनी सीने के छाले रौंद गई कटी छिली हाथों की लकीरें एक संघर्ष सुनाती हैं सूरज के ताप से जलती गोद मेरी उनके कदम जलाती है निराशा से ग्रस्त नयन आस को निहारते कहीं दिख जाए कोई जल भोज बाटते महामारी ने मुंह बांधा तो मार भूख की बड़ी लगे पेट पे कपड़ा बांध लिया आंस... »

मजबूर हुए मजदूर……..

सपनो की दुनिया आँखों में लिए चले थे दूर, पता नहीं था हो जायेंगे वो इतने मजबूर | षडयंत्रो की चालो में जो बुरे फंसे मजदूर, कहाँ पता था हो जायेगा वक़्त भी इतना क्रूर || टूट रहा हैं पत्थर दिल पर महामारी की आहत में, शहर चले थे हालातों के परिवर्तन की चाहत में|| बंद पड़े हैं दफ्तर सारे नहीं जेब में पूंजी हैं, खाली दिल की उम्मीदें ही सबसे वाजिब कुंजी हैं || खैर चल रही रेल किसी प्यासे को लगती पानी हैं, पर पा... »

मजदूर की मजबूरी

हां मजदूर है; सो मजबूर हैं, उनकी क्या खता; जो घर से दूर हैं पैदल चल- चल; थक कर चूर हैं, सड़कें सारी; तपती तंदूर है, ट्रेनों में भी; भीड़ भरपूर है, सरकारों को आखिर; कैसे मंजूर है कैसा यह; बना दस्तूर है, जो मजदूर है; आज मजबूर हैं जिसने सबके सपनों को, मेहनत से किया पूरा आज उसी के सपनों का, कोविड ने कर दिया चूरा कहीं पांव में छाले, कहीं खाने के लाले पानी पिये तो खाली, पड़े हैं सारे प्याले इंसानों की म... »

लाचार

वक्त ने कैसा करवट बदला बेज़ार होकर। तेरे शहर से निकले हैं बेहद लाचार होकर। पराया शहर, मदद के आसार न आते नज़र, भूखमरी करीब से देखी है बेरोजगार होकर। तय है भूख और गरीबी हमें जरूर मार देगी, भले ही ना मरे महामारी के शिकार होकर। आये थे गाँव से, आँखों में कुछ सपने संजोए, जिंदगी गुज़र रही अब रेल की रफ़्तार होकर। बेकार हम कल भी न थे, और ना आज हैं, दर-ब-दर भटक रहे, फिर भी बेकार होकर। जरूरत मेरी फिर कल तुझक... »

मजदूर

हमारा कसूर क्या था आखिर क्यों मजदुर हुए हम दर दर भटकने पर मजबूर हुए हम इस महामारी से तकरार है रोजी रोटी की दरकार है अपनों से मिलने के लिए बेक़रार हुए हम मरने का खौफ नहीं अपनों के साथ जीने मरने की खायी है कसम इस कसम को निभाने के लिए नाराज रास्तो पे चल पड़े हम जिन्दा रहे तो कीड़ों-मकोड़ों से रेंगते नजर आयेंगे । मर गए तो ये सवाल, तुझसे पूछे जायेंगे । मेरा कसूर बता, क्यों मजदूर हुए हम । »

आ अब लौट चले

अब छोड़ चले हम परदेश । जब से लगी किस्मत में ठेस ।। घर परिवार में मिल जायेंगे । वहीं पे रूखी सुखी खायेंगे।। एक तरफ करोना के शैलाब । दूसरे तरफ मौत के शैलाब ।। कहीं काल हमें निगल न ले । क्यों न इससे पहले लौट चले। । जान है तो ए सारा जहान है । यहाँ सब अपनो में परेशान है ।। मास्क लगाये दिल घबड़ाए । देखो सब अपनो से दूरी बनाए। । सारे काम काज हो गए बंद । करोना जो दिखाया अपना रंग ।। न मिला सहारा न मिला दाना... »

लौटकर शीघ्र आऐंगे बाद-ए-कहर

चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों। लौटकर शीघ्र आऐंगे बाद- ए-कहर दोस्तों।। साथ तेरा मिला हमें कदम -दर-कदम। चीन से आके वाइरस ये बड़ा बेरहम।। है ये कैसा मचाया जुल्म -ओ-कहर दोस्तों। चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों ।। मेहनत से हमने भी तुझको अन धन का भंडार दिया। तूने भी तो मुझको निज बच्चे -सा हीं प्यार दिया।। बैठ के खाऊँगा आखिर कब तक इस कदर दोस्तों। चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों।। लौटकर श... »

मैं मजदूर हूँ

विलासता से कोसों दूर हूँ। हाँ, मैं मजदूर हूँ। उँची अट्टालिकाएँ आलिशान। भवन या फिर सड़क निर्माण। संसार की समस्त भव्य कृतियाँ, असम्भव बिन मेरे श्रम योगदान। फिर भी टपकते छप्पर के तले, रहने को मैं मजबूर हूँ। हाँ, मैं मजदूर हूँ। वस्त्र, दवाईयाँ या फिर वाहन। संसार की अनन्य उत्पादन। असम्भव बिन मेरे परिश्रम, कारखानों की धूरी का घूर्णन। तपती धूप में पैदल नंगे पाँव, चलने को मैं मजबूर हूँ। हाँ, मैं मजदूर हूँ... »

मजदूर की व्यथा

कोरोना नामक महामारी हमारे देश में है आई इस महामारी ने पूरे प्रशासन में हड़कंप है मचाई। सरकारों ने महामारी से निपटने के लिये कई तरकीब है अपनाई पर सबसे सख्त तरकीब तालाबंदी नजर आई। मध्यम वर्गीय और रईसों ने इस फैसले की खूब की बढ़ाई पर अंतत: सबसे ज्यादा पिसे हमारे गरीब मजदूर भाई। मध्यम वर्गीय और रईसों ने, तालाबंदी में घर में खूब बनाये व्यंजन और मिठाई लेकिन गरीब मजदूर ने भोजन कम, दर-दर की ठोकर ज्यादा खा... »

फिर आएँगे

कह चले हैं अलविदा उन शहरों को जिनमें हम कमाने-खाने आए थे, महामारी में बचे रहे तो.. फिर आएँगे l मजदूर हूँ, हुनर हाथों में और दिलों में सपने लिए आएँंगे इंतजार था बंद खुलने का, अपनों से मिलने का, चिंता मत करो साहब! महामारी बीत जाने दो, जिंदा रहे तो फिर आएँगे l कह चले अलविदा उन शहरों को, जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l अब तो रेल गाड़ी की रफ़्तार कम सी लगती है , यादों की रफ़्तार के आगे.. चैन तो तभी मिलेगा... »

नमस्कार

कवि /कवित्रियों की वेब गोष्ठी को पूनम का प्रणाम🙏 आप अनुभवी गानों में एक कविता प्रस्तुत करने का साहस कर रही हूंँ आपके स्नेह और सहयोग की आकांक्षा है. »

चल पडे बैठकर रेल में

ये मेहनतकश हैं भारत के, चल पडे बैठकर रेल में इनकी दुविधा समझें हम सब, ना लें इसको खेल में देश बन्द हुआ, काम बन्द हुआ पेट बन्द तो नहीं होता काम नहीं, कमाई नहीं है, भूखे पेट कैसे सोता., ना खाना है ना दूध मिला घर में भुखा बालक रोता भुखमरी की दुर्दशा रहे थे ये झेल गांव इनके इनको ले चली ये रेल »

फोटो पर कविता प्रतियोगिता :- शीर्षक – “सुनों!!”

!सुनों! सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं| क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो, अब तक ये कुटुंब से दूर है| भूतल से नभतल तक यह जो हाहाकार मचा, प्रकृति ने शुरू अपना तांडव जो किया, मनुष्य के मुँह पर जोरदार तमाचा दिया, यह जो प्रकृति का बरसा है कहर, हकीकत में मनुष्य द्वारा ही दिया गया है जहर| सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं| प्रश्न यह मन में उठता है.. ... »

कोरोना या करुणा

कोरोना या करुणा ! मानव मन की तृष्णा या फिर समय को रोककर गीता ज्ञान सुनाए कृष्ण ! विकास का अवकाश या फिर प्रकृति का राज्य – अभिषेक ! कोरोना या करुणा ! दिखने लगे हैं जंगल के जान वर, घरों में छिपने लगे मानव जाति के सभी मान्य वर! दिखने लगा है हिमालय गंगा नदी का निर्मल पानी नहीं चलेगी मानव की मनमानी! कोरोना या करुणा! गलती की थी पासपोर्ट ने सजा काटता राशनकार्ड प्रकृति का न्याय कहो या शासन का अन्याय... »

देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया

देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया ? जिसे अपना बनाया वही बेगाना शहर हो गया।। लेके दिल में तमन्ना था आया यहाँ। बन्द सब कुछ हुआ अब जाए कहाँ? न खाने को कुछ है बचा और जीना दुष्कर हो गया। देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।। बन्द फैक्टरी हुई सब धन्धा गया। कार रिक्शा चलाना भी मन्दा भया।। अब तो किराये के घर से भी बेघर हो गया। देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।। कोई पैदल चला कोई साईकिल सवार। बस ... »

“खिड़कियों से झांकती आँखें”

कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी) की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें। इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं। कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं । अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता ह्रदय को अधीर कर रही है। परंतु कोरोना महामारी का भय यह सोचने पर मजबूर कर रहा है, कि कहीं अपने परिजनों को हम भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो प्रदान नहीं कर रहे? यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन सहयात्रियों को व्यथित कर रही है। मुख ... »

यादों को फिर से समेटना है।

जब छोड़ के आए थे गाॅऺव को हम, तब हमें न पता चला था अपना ग़म, लेकिन इस महामारी में याद आए गाॅ॑व के हसीन पल, जहां मिल जाता था हर समस्या का हल, आज लंबे अरसे के बाद वहां जाना है, क्योंकी यहां हर मजदूर बेबस और बेचारा है, रेलवे में बैठकर एक दफा इस शहर को देखना है, छुटी हुइ यादों को एकबार फिर से समेटना जो है। »

बेहाल मजदूर

आया ‘कोरोना वायरस’ सबसे ज्यादा हम बेहाल हुये। सच कहता हूँ हम मजदूरों के बहुत ही बुरे हाल हुये। छूटा रोजगार तो, दाल रोटी के लाले हो गये। मकान मालिक भी किराये के, तलाशी हो गये। हम मजदूर,मजबूर, बेबस व लाचार बन गये। उठा झोला परिवार संग, घर की ओर चल दिये। न ट्रेन,न ही मोटरकार, और न ही कोई बस मिली। पैदल ही चले क्योंकि न, कोई और आशा दिखी। हम गिरे,गिरकर फिर उठे, चल दिये,चलते गये। खुद रोये,खुद ... »

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