मुझ से उकता कर
खिड़की से भाग गई
वो शाम जो साथ थी मेरे
ले आई पकड़ एक रात
और खुद छुप कर भाग गई
रात सिरहाने पे बैठी रही
रात भर देती रहे ताने
कुछ मेरे अपने से कुछ अनजाने
गुफ्तगू करती रही मुझसे
कुछ मेरे ही अंदर के पुराने
न सहर की कोई बात न नई सौगात
वही रात की कहानी वही रात की बात
राजेश’अरमान’
मुझ से उकता
