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युग धारा

युग धारा

एक युग बीत चला है देखो
एक ऊर्जा शक्ति निकल रही
चीर भानू के किरणों को
चांदनी रोशनी फैला रही है

बरखा भी इठला रहा है
नभ अम्बर की छाया में
मुदित हुआ भुमण्डल सारा
बादल कि गर्जना में

मोर हुआ है व्याकुल सा
पपीहा प्यासा तड़प रहा
हवा बसंती बह रही है
फूलों पर भौंरे गुंज रहें

बसंती हवायें झूम रहीं
नभ तम के आंगन में
ओंस कि बूंदें चमक रहीं
धरा पर जैसे मोती की माला

महेश गुप्ता जौनपुरी

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