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लोगों की परिस्तिय़ाँ अब कुछ ऐसे होने लगी है

लोगों की परिस्थितियाँ अब कुछ ऐसी होने लगी है ।
लोग भौतिकवादिता की ओर अब बढ़ने लगे है।
चारों तरफ हा-हाकार मची है जनसंख्या नियंत्रण का।
फिर भी लोग इन्द्रियों के दास बनने लगे है ।।1।।

खाने को भोजन, पहनने को वस्त्र, रहने को घर अब उपलब्ध होते नहीं।
खेत में बनते अब मानवों के भौतिक साधन, कच्चे पेड़ों को काट रहे हैं आज मानव।
जब खेत में बने मानवीय भौतिक साधन, तब कैसे मौलिक आवश्यकता पूरी हो मनुज का।
मनुज अब पुरातन संस्कृति से गिरने लगे है, लोग अब भौतिक वस्तुओं के पीछे भागने लगे है।।2।।

जब होने लगे प्रकृति का ह्रास तब प्रकृति ही संभाले अपने बुरा हाल।
मानव को अपनी मानवीयता सिखलाये याद कराये उन्हें सनातन धर्म पुरातन व्यवहार।
जब लोग करने लगे प्रकृति का देख-भाल, तब प्रकृति भी देने लगे उन्हें वृक्ष-छाया फलेदार।
जब तब करेंगे हम प्रकृति से प्यार, तब तक प्रकृति नहीं हमें देंगे कोई आपदा-संकट-काल ।।3।।
कवि विकास कुमार

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