वृद्धा आश्रम
बुढ़ि आंखें ना जाने कब से
देख रही हैं मुझको
एक टक लगाये निहार रही
बरसों से मुझको
कैसे कर लु मैं किनारा
इनका कौन है सहारा
यह छोटा सा वृद्धाश्रम
है सभी का गुजारा
पाप पुण्य की पावन धरा पर
यही है इनका आशियाना
बेटा कहकर है सबने मुझे पुकारा
कैसे रिस्ता तोड़ दु कौन है इनका सहारा
बेसहारा मैं ही हूं लाठी
अंधेरे में सहारा
अनाथ के आंगन में
ईश्वर ने जन्नत है उतारा
ठुकरा दु मैं कैसे
हे ईश्वर मैं अपने जन्नत को
भूल ना जाये हम बचपन को
देना मुझे आशीष अपना
महेश गुप्ता जौनपुरी
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