Site icon Saavan

वो इतना ही कह सका

वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से
जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे

कौन समझा है इन हवाओं के रुख को यहाँ
इख्तियार नहीं है इन हवाओं के आक़िबत पे

हर्फ़ निकले लबों से ,ज्यों जां निकलती है
जब तेरी बेरुखी को सजाया था अपनी आदत पे

लो फिर छेड़ दी दास्ताने-हिज़्र तुमने ‘अरमान’
क्या हो जाता है हासिल तुझे खुद की उक़ूबत पे

वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

राजेश ‘अरमान’
उक़ूबत= दंड, सजा, उत्पीड़न, यातना
आक़िबत= अन्त, परिणाम, भविष्य
निस्बत= सम्बन्ध, स्मोह, सम्बन्ध लगाना,

Exit mobile version