चढ़ती हुई धुंधलाहट,
बादलों में छुपता सूरज,
उतरता हुआ नशा शराब का
और
चढ़ता हुआ नशा तुम्हारा
इन तारो को जब मैने चांद के सामने टिमटिमाते हुए शर्माता देखा,
शर्म के मारे मैने आंखें बंद कर ली और तुम हवा सी आईं और मेरे बालों को सहलाने लगीं
मेरा नशा तुम्हारे एहसास के वियोग में मदमस्तता से तड़प रहा था,
बस तभी मेरे दिल की धड़कन धीमी होने लगी, m
सोचते सोचते मैंने आंखों को बंद किया और तुम मुझे मिल गईं।
मिल गई वो शून्यता।