आज कल बेरोजगारों की कहाँ मेरे यार सुनती है,
उल्टी सीधी जैसी भी हो जनता सरकार चुनती है,
कानों पे जूं भी नहीं रेंगती चाहे चीखलो जितना,
पर बात गर अपनों की हो तो बारम्बार सुनती है,
तार दिलों के दिलों से अब मिलते नहीं देखे जाते,
बहरी हो महबूबा मगर फिर भी हर बार सुनती है।।
राही अंजाना