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सुकूँ

इतनी भीड़ में भी न जाने कैसे यहाँ सुकूँ मिलता है,
एक दूजे को देख ही लोगों का जहाँ पे खूं जलता है,

डरते हैं पास से गुजर जाने भर के ख्यालात से राही,
वहीं सुबह शाम वो मुझे अकेला भला क्यूँ मिलता है,

ज़मी पे मुमकिन नहीं शायद तो आसमां तलाशता हूँ,
के ऑंखें बन्द जो कर लूँ सामने वो जूं का तूँ मिलता है,

राही अंजाना

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