हर लम्हा गुजर गुजर कर कुछ कह गया
अपनी आँखों में हल्का सा कुछ तैरता गया
ज़िद जिनकी थी वो ज़िद में रह गए
हाथ से उनके कोई फैसला सा गया
ज़िंदगी कुनकुनी धुप तो कभी चुभती तपन
वो कहते क्यों वो कुम्हलाया सा गया
असर किसी का किसी पे होने में
वक़्त लगता मगर किसी से लगाया न गया
फासले कैसे भी हो मिट सकते है
सरहद की तरह कभी हमसे बनाया न गया
जिसको हासिल बुत सी ख़ामोशी ‘अरमान’
क्यों कहते उससे हाथ मिलाया न गया
राजेश ‘अरमान’
हर लम्हा गुजर गुजर
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One response to “हर लम्हा गुजर गुजर”
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वाह
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