न तख्तो पे न ताज़ों पे नज़र रखता हूँ
न कोई जलवा न रिवाज़ों पे नज़र रखता हूँ
जो देखने का मुझे बंद आँखों से जुनूँ रखते है
बंद आँखों से , उन बंद आँखों पे नज़र रखता हूँ
राजेश’अरमान’
न तख्तो पे न
Comments
One response to “न तख्तो पे न”
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वाह बहुत सुंदर
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