कैसे मुडेगे पैर

कैसे मुडेगे पैर

हाथों मे टिफिन लेकर, कंधे पर बॅग रखकर दफ्तर को बस निकलने की ही देर है,
तभी होती सभी के जीद की मेहर है,
मना करने पर कोई रोता है, इसीलिए हाँ कहना ही पडता है,
किसको चाहिए कपडे, किसीको खिलोने, 
दवाई,  तो चाहिए किसको गेहने।

जेब से निकलते पैसे किसी एक की ही इच्छा पूरी कर पाते है,
सोचा दफ्तर जाकर लेलू किसीसे उधार,
पर जाकर मिला सभी से इंकार।

लौटते हुए पैर बैठ गए किसी कोने मे, रोकर भी क्या फायदा है अब रोने मे,
तभी आया मन मे पाप का साया, चोरी, डकैती जैसे विचारों ने मन मे घर बनाया,
दोस्ताना भूलाकर चढ गया मन मे बैर,
एक बार जो चल पड़े इन रास्तों पर, सोचता हूं, अब कैसे मुडेगे वो
पैर।

– मानव।

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