बिछड़ने के ख़्याल से हम मिलने से डरते हैं,
मगर कैसे बताएँ किस कदर तनहा मरते हैं।
देख न ले वो हमें, कहीं पुकार न ले दरीचे1 से,
उनकी गलियों से हम अब गुज़रने से डरते हैं।
सूख गए हैं ग़म काँटों से, दश्त2 में सख़्त होकर,
उनके वहाँ गुलाब अभी भी बाग़ों में बरसते हैं।
उन्हें चाहने के सिवा क्या ही किया है हमने,
अब मगर उन्हें यूँ बेहिसाब चाहने से डरते हैं।
इंतज़ार रहता था हमें बरसात का साल भर,
मगर अब भीगने के ख़्याल से ही डरा करते हैं।
दर्द को लिख दें हम मगर मजबूर हैं क्या करें,
दिल की दरारों से बाहर आने से वो मुकरते हैं।
चल लिए शब-भर3, दम-ए-फ़िराक़4 गुज़रा नहीं,
थक गए हैं बहुत अब हम, आओ ज़रा ठहरते हैं।
1. खिड़की; 2. निर्जन क्षेत्र; 3. पूरी रात; 4. अलगाव का समय।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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