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अपने फ़साने-ए-ग़म

अपने फ़साने-ए-ग़म मैं किसको सुनाऊँ,
हाल-ए-दिल-ए-हस्सास1 किसको बताऊँ।

ये दिल की उलझन, ये सितम-ए-हयात2,
अब इन हालातों को मैं कैसे सुलझाऊँ।

हर शख़्स ख़ुश है, अपनी ही दुनिया में,
अपनी तन्हाई से मैं किसको मिलाऊँ।

आँसुओं की ज़ुबाँ कौन समझेगा यहाँ,
पन्ना-ए-जज़्बात मैं अब किसको पढ़ाऊँ।

रातें लम्बी हैं और सितारे हैं ग़ुम कहीं,
शमा को आख़िर अकेले कैसे जलाऊँ।

बड़ा बेदर्द है ज़माना और इसकी रिवायतें3,
जहाँ के बद-नुमा4 रिवाज़ मैं कैसे निभाऊँ।

1. संवेदनशील दिल की दशा; 2. जीवन की निर्दयता; 3. परंपराएं; 4. भद्दे।

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