Author: माया अग्रवाल

  • अन्नदाता की व्यथा

    टुकड़े-टुकड़े हुई मेदिनी , कैसी ये लाचारी है ।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    शीश पकड़ बैठा किसान है , प्रश्न हजारों साल रहे ।
    कैसे अन्न उगाऊँ मैं यदि , सूखे जैसे हाल रहे ।
    बिन बरसे ही मेघ सिधारे , प्यासी धरा हमारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    कर्जदार था पहले से ही , धरती माता रूठ गई ।
    कैसे मैं परिवार चलाऊँ , आस अन्न की टूट गई ।
    व्यथा वंश की शूल चुभाए , भार हृदय पर भारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    जल बिन जीवन हुआ असंभव , चमत्कार विधिना कर दे ।
    कहीं पेड़ से लटक न जाऊँ , खेतों में पानी भर दे ।
    पानी लेकर अन्न दान दूँ , उतरे सभी उधारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    करुण पुकार न पहुँची उस तक , जो जग का पालनहारा ।
    समाधान जब नहीं हुआ तो , तरुवर पर फंदा डारा ।
    झूल गया यूँ कृषक निशा में , गृह में सुता कुंवारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    ✍ माया अग्रवाल
    👉 विशाखापट्टनम

  • अन्नदाता की व्यथा

    “अन्नदाता की व्यथा ”
    टुकड़े-टुकड़े हुई मेदिनी , कैसी ये लाचारी है ।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    शीश पकड़ बैठा किसान है , प्रश्न हजारों साल रहे ।
    कैसे अन्न उगाऊँ मैं यदि , सूखे जैसे हाल रहे ।
    बिन बरसे ही मेघ सिधारे , प्यासी धरा हमारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    कर्जदार था पहले से ही , धरती माता रूठ गई ।
    कैसे मैं परिवार चलाऊँ , आस अन्न की टूट गई ।
    व्यथा वंश की शूल चुभाए , भार हृदय पर भारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    जल बिन जीवन हुआ असंभव , चमत्कार विधिना कर दे ।
    कहीं पेड़ से लटक न जाऊँ , खेतों में पानी भर दे ।
    पानी लेकर अन्न दान दूँ , उतरे सभी उधारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

    करुण पुकार न पहुँची उस तक , जो जग का पालनहारा ।
    समाधान जब नहीं हुआ तो , तरुवर पर फंदा डारा ।
    झूल गया यूँ कृषक निशा में , गृह में सुता कुंवारी है ।।
    ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।
    ✍ माया अग्रवाल
    👉 विशाखापट्टनम

New Report

Close