****** यही सोचा मैं ज़िंदगी की बेहिसी पर ग़ज़ल कहूँगा अज़ाब तेरे, तेरी अज़ीयत की चाशनी पर ग़ज़ल कहूँगा भटक रहा हूँ मैं कबसे तन्हा न हमसफर है न रौशनी है ये सहरा सहरा भटक […]

जितने भी थे फरेबी सियासत में आ गये बाकी बचे जो उनकी हिमायत में आ गये कानून को जो खेल समझते रहे सदा वो आज देख लीजे अदालत मे आ गये अब पाँच साल बाद […]

आँखों को इंतज़ार की आदत नहीं रही अच्छा हुआ के प्यार की आदत नहीं रही मिलती नहीं किसी से तबियत हमारी अब हमको किसी भी यार की आदत नहीं रही बुज़दिल नहीं रहा मैं कभी […]

टूटी नींद मेरी तुम्हारे ही ख्वाब से तुम बस गये हो आँखों में अब महताब से इक सफ्हा ज़िंदगी का पुरानी किताब से कुछ लम्हा -ए- फिराक़ जो गुजरे अज़ाब से मैंने कहा हिसाब बराबर […]