इक दावानल सी धधक रही, अंतर्मन ज्वाला भभक रही, नयनों तक आ न सकी कभी अश्रु धारा वह सिसक रही। आसक्त मैं कितना हुआ भला, निर्जन मैं कितना चला भला, बोलो आखिर कब थका भला? […]