Author: Dhirendra Pratap Singh

  • स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त

    *15 अगस्त का महापर्व*

    कभी सोने की चिड़िया सा,
    ये हिंदुस्तान हमारा था !
    जमी पर जैसे जन्नत था,
    जगत जग-मग सितारा था !
    लुटेरों ने इसे न जाने,
    कितनी बार है लूटा !
    जुड़ा है टूट कर के ये,
    जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !

    कहानी न महज समझो,
    नही कोई है ये किस्सा !
    नही इतिहास ये पूरा,
    फकत छोटा सा है हिस्सा !
    अभी भूले नही थे हम,
    पिछले/मुगली प्रशाशन को !
    नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
    गोरे कुशाशन को !

    तृषित था तंत्र भारत का,
    ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
    समय का चक्र ये देखो,
    की बिल्ली दूध की प्रहरी !
    अतिथि देवो भवः की ये धरा,
    फिर भी रही ठहरी !
    हमारे पूर्वजों के शान पे,
    थी चोट अब गहरी !

    उठा भूचाल भूतल पर,
    उगे लंगड़ी शमा के पर !
    अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
    औ टूटे सब्र के सागर !
    जने तब लाल भारत में,
    अपनी जननी की कोखो से !
    तपा अब जर्रा-जर्रा था,
    दिखीं लपटें झरोखों से !

    इरादे जीतने का लेके,
    बच्चा बच्चा था आया !
    चुनी अब राह सबने वो,
    जिसे था जो भी है भाया !
    उऋण हो गोद भारत माँ की,
    अब बहशी फिरंगी से !
    हराई शूरमों ने तोपे,
    बस तलवार नंगी से !
    कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
    कोई था वीरगति पाया !
    उन्ही वीरों-शहीदों ने,
    देश आज़ाद करवाया !

    हटी बरसों की जिल्लत,
    जब तिरंगा नभ पे लहराया !
    सभी ने साथ मिलकर था,
    ये बन्दे मातरम गाया !
    हमारे उन शहीदों ने,
    हमें ये दिन है दिखलाया !
    वही ये ऐतिहासिक दिन
    *स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !

    हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
    इस राष्ट्र मधुबन में !
    हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
    प्रफुल्लित हो उठे मन में !

    हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
    ने जब,
    हमें ये दिन था दिखलाया !
    वही इतिहास ने हमको,
    *स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!

    🙏🙏🙏
    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    *भूत पूर्व सैनिक*
    रायबरेली उत्तर प्रदेश

  • स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त

    *15 अगस्त का महापर्व*

    कभी सोने की चिड़िया सा,
    ये हिंदुस्तान हमारा था !
    जमी पर जैसे जन्नत था,
    जगत जग-मग सितारा था !
    लुटेरों ने इसे न जाने,
    कितनी बार है लूटा !
    जुड़ा है टूट कर के ये,
    जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !

    कहानी न महज समझो,
    नही कोई है ये किस्सा !
    नही इतिहास ये पूरा,
    फकत छोटा सा है हिस्सा !
    अभी भूले नही थे हम,
    पिछले/मुगली प्रशाशन को !
    नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
    गोरे कुशाशन को !

    तृषित था तंत्र भारत का,
    ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
    समय का चक्र ये देखो,
    की बिल्ली दूध की प्रहरी !
    अतिथि देवो भवः की ये धरा,
    फिर भी रही ठहरी !
    हमारे पूर्वजों के शान पे,
    थी चोट अब गहरी !

    उठा भूचाल भूतल पर,
    उगे लंगड़ी शमा के पर !
    अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
    औ टूटे सब्र के सागर !
    जने तब लाल भारत में,
    अपनी जननी की कोखो से !
    तपा अब जर्रा-जर्रा था,
    दिखीं लपटें झरोखों से !

    इरादे जीतने का लेके,
    बच्चा बच्चा था आया !
    चुनी अब राह सबने वो,
    जिसे था जो भी है भाया !
    उऋण हो गोद भारत माँ की,
    अब बहशी फिरंगी से !
    हराई शूरमों ने तोपे,
    बस तलवार नंगी से !
    कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
    कोई था वीरगति पाया !
    उन्ही वीरों-शहीदों ने,
    देश आज़ाद करवाया !

    हटी बरसों की जिल्लत,
    जब तिरंगा नभ पे लहराया !
    सभी ने साथ मिलकर था,
    ये बन्दे मातरम गाया !
    हमारे उन शहीदों ने,
    हमें ये दिन है दिखलाया !
    वही ये ऐतिहासिक दिन
    *स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !

    हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
    इस राष्ट्र मधुबन में !
    हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
    प्रफुल्लित हो उठे मन में !

    हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
    ने जब,
    हमें ये दिन था दिखलाया !
    वही इतिहास ने हमको,
    *स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!

    🙏🙏🙏
    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    *भूत पूर्व सैनिक*
    रायबरेली उत्तर प्रदेश

  • कृष्णलीला

    *कृष्ण लीला*

    तू दधि चोर तो; तोही न छोडूं,
    पकड़ बांह तोरे; कान मरोड़ूँ !
    लल्ला मेरो मोही हिय ते प्यारा
    तोसे कुढ़त गोकुल ब्रिज सारा

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    जग के पालक: जननी के बालक,
    प्रहसन करते; जग संचालक !
    जड़ चेतन बंशी सुन हिलते!!
    ग्वालन संग जमुना तट मिलते,

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    गाय चरैया, पर्वत को उठइया,
    बिषधर को, जमुना में मरैया !
    पुरबाशिन को लाज न आवत,
    मोरे लल्ला को, चोरी लगावत!!

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    भूत पूर्व सैनिक
    रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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