Author: Hari Paudel

  • प्रभु अब तो बुला ले

    प्रभु अब तो बुला ले
    प्रभु अब तो अपने पास बुला ले
    छल -कपट की इस दुनियाँ में
    क्या बचा अब काम हमारा
    जहां जहान के सारे रिश्ते
    अपनी – अपनी कीमतें लिये
    रिश्तों के बाज़ार में बिकते …
    तेरे सिवाय अब कौन संभाले
    प्रभु अब तो अपने पास बुला ले……..
    दुखों ने मुझको तोड़ दिया है
    घरवालों ने छोड़ दिया है
    इन लड़खड़ाते कदमों में
    तेरे नाम की छड़ी का सहारा है
    तुझसे उम्मीदों को पाले
    प्रभु अब तो अपने पास बुला ले……
    किलकारियों से भरा वो आँगन
    जहां पंछी कलरव करते थे
    कोयल गीत गातीं थीं
    आज उजड़ कर हुये वीरान
    स्वार्थ -सिद्धि के लगे हैं जाले
    प्रभु अब तो अपने पास बुला ले…….
    घर के लोग हुये बेगाने
    खत्म हुये अब सब याराने
    मतलबी हुआ सारा संसार
    अय दुनियाँ के रखवाले
    प्रभु अब तो अपने पास बुला ले…..
    हरि पौडेल
    नेदरल्याण्ड
    १२-१०-२०१४

  • हिन्दुस्तान की ब्यथा

    भारत!
    अब न भारद्वाज कि
    भारत रही
    न अकबर की
    हिन्दुस्तान
    एक कलियुग का
    सुदामा
    हाथों मे दिया लिए हुए
    हिन्दुस्तान
    ढूढ़ रहा था
    कचरे कि ढेर मे
    उसकी उंगलीयाँ
    थिरक रही थि
    और भारत!
    बिलखतेहुए बच्चो को
    फुटपाथ पर छोडकर
    सर पे कम्प्युटर के
    बोझ लिए हुवे
    भाग रही थि
    चाँद कि तरफ
    किसे फिकर है
    भारत की
    इस सुदामा को?
    और यह दीन दुखि:
    सुदामा!
    हसरत भरि नजरो से
    दानीयों को ढूढ़ रहा था
    यह दिन कि लाली
    इस दीन का कर्मक्षेत्र था
    उसके हाथो का कटोरा ही
    हिन्दुस्तान की
    ब्यथा थी

    हरि पौडेल

  • फुटपाथ

    सिकुड़कर फटि हुई कपड़ो मे
    गठरीनुमा होता जारहा है वह
    मायुस सा
    आँखो मे प्रचुर गम्भीरता लिए हुवे
    जैसे मजबूर मुक पशु हो
    पडा है फुटपाथ मे
    इसे देख अपने बदन के सुटको
    उतार फेकनेको जी चाहता है
    खामोस आँखो से वह
    बहुत कुछ कहरहा है, इस जमाने को
    टुकुर टुकुर हसरत भरी नजरो से
    देखता है
    कोइ राहगीर
    चबाये जो सेव को
    गटर मे फेके जुठा पत्तल
    जो चाटा उसने
    डैनिग टेबुल मे सजे पकवानोको देख
    उल्टी करनेको जी चाहता है
    क्यों एक इन्सा इन्सानको
    करती है इतनी जिल्लत
    कौनआया है कुछ लेकर यहा
    और लेकर क्या हम जाएंगे
    किसने बनाई इस भेद भावको
    कौन आकर सम्हालेगा अब
    फस गया मै इस किस दुभिदा मे
    कैसे सम्हालु मेरे मन और मस्तिष्कको
    अब तो सर को दिवार मे फोडनेको जी चाहता है

    हरि पौडेल

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