Poems

शिवांशी

मैं शिवांशी , जल की धार बन

शांत , निश्चल और धवल सी

शिव जटाओं से बह चली हूँ

अपने मार्ग खुद ढूँढती और बनाती

आत्मबल से भरपूर

खुद अपना ही साथ लिए

बह चली हूँ

कभी किसी कमंडल में

पूजन को ठहर गई हूँ

कभी नदिया बन किसी

सागर में विलय हो चली हूँ

जिस पात्र में रखा उसके

ही रूप में ढल गई हूँ

तुम सिर्फ मेरा मान बनाये

रखना, बस इतनी सी इच्छा लिए

तुम्हारे संग बह चली हूँ

मुझे हाथ में लेकर जो

वचन लिए तुमने

उन वचनों को झूठा होता देख,

आहत हो कर भी , अपने अंतर्मन

के कोलाहल को शांत कर बह चली हूँ

खुद को वरदान समझूँ या श्राप

मैं तुम्हारे दोषों को हरते और माफ़ करते

खुद मलीन हो बह चली हूँ

हूँ शिवप्रिया और लाडली अपने शिव की

उनकी ही तरह ये विषपान कर

फिर उन्हीं में मिल जाने के लिए

अपने कर्तव्यों का भान कर

निरंतर बह चली हूँ

अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

तू

तू आया तो बसन्त है….।

तू गया तो बस अन्त है।।

कुफ्र

अतीत के फफोले
तेजाबी बारिश
दहकते लावे की तपिश
या कोई आतिश
ताउम्र का सबक
बस एक कुफ्र।
निमिषा

गुजारिश

गुजारिश की मैने लाखों दफ़ा
रो रोकर उससे
दिल ना पसीजा मगर उसका
आंखें बंद होने को आयी हैं
बहुत रो चुके अब
दर छोड़ चला उसका

दिल रोंक लेता है

रोज सोचते यही है उनसे
तोड़ देंगे सारे नाते

याद में उनकी नहीं कटेगी
रो-रोकर मेरी रातें

फ़ैसला जब करते हैं
हम दिल रोक लेता है

मेरी आँखों से बहे समंदर
घुटती हूं अंदर ही अंदर

दर्द है जब हद से बढ़ जाता
दिल रोक लेता है

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