Author: Vaishnavi

  • AMMA

    देखो उस बुढ़िया को,घर के कोने मे जो रहती है
    आँगन मे डली चार पाई, पर रोज़ वो बैठी रहती है
    शरीर मुरझाया सा ,ना आँखों मे कोई किरण
    ख़ुशियों का तो ना अता पता
    बस गम मे डूबी रहती है
    पर जब कभी भी यूँ गुज़रू उधर से
    देख मुझे एक झूठी मुस्कान दे देती है,
    दिखावटी बड़ी है ;
    पूछो भला उससे अम्मा कैसी हो?
    “हमको का हुई सकी, खुस हैं । ”
    कह खुशहाली का दिखावा कर देती है
    ये झूठी दिलासा ना जाने वो किसे देती है?
    क्यूंकि उसका दुःख, उसकी वेदना, उसके कष्ट
    उसकी वो झूठी मुस्कान, उसकी आशाहीन आँखें हीं बता देतीं हैं
    देखो उस बुढ़िया को जो हर दुख ,
    हँसते हँसते सहती है ।
    लड़के को पाली पोसि, पलकों मे बैठा यूँ बड़ा करी
    लड़का तोह निकला खुदगर्ज़, माँ की उसको कहा पड़ी,
    ना कपड़े दे ना पैसे, ना ही कराये बुद्धी का इलाज़
    दो वक़्त की रोटी दे बस
    उसमे भी सुनाए बातें सौ-खरी
    देह साथ छोड़ चुकी पर पैसे कमाने अम्मा है चली
    “मरने से पहिले गंगा नहाइ लें”
    ये सपने वो देखी है
    इतनी मेहनत करने पर भी जिंदगी उसको निरशायें ही देती है
    ना जाने कैसे इतनी मुश्किलें वो हँसते हुए सेहती है
    देखो उस बुढ़िया को जो आज भी आशा का चिराग़ जलाये रहती है।
    जाड़े का महिना; गलती हुई ठंड, और शीत लेहेर् जब बहती है
    सूरज का नामो निशाँ ना होता, धुंध चारों दिशाओं मे फैली रहती है
    उसी रोज़ की बात हुई
    मुझे अम्मा वापिस दिखी, पर इस बार कुछ अलग था;
    ना उसके पैरों मे चप्पल, ना हाथों मे दस्ताने
    ना कानों पर तोपा, ना ही बदन पर वो गरम कपड़े पुराने
    बस काग़ज़ जैसी शाल लपेट
    वो वही खाट पे बैठी मिली,
    देख उसे मेरी रूह काँप गई , मन कुछ यूँ घबरा गया
    *इस ठंड मे ये कैसे रहतीं हैं *
    ये सवाल जेहेन् मे आ गया
    ना जाने कब दिल की बात जुबां पे आ गई,
    “हमाउं पास कछु नाही, तुम्है एक थे कंबल ला डइ ”
    उसका ये जवाब सुन मे दंग रह गई,
    सरपट भागी यूँ घर को और जो ला कर उसको कंबल दी लगी
    “अरे!! तू तोह सही मा कंबल लई आई”
    ये कह वो हसने लगी, हँसते हँसते उसका गला भर आया
    फिर आँखों से अश्रु पोछने वो लगी
    गंगा नहाने क्यों जाना है उसे??
    उसकी तो आँखों से गंगा बहती है
    देखो उस बुढ़िया को जो सबको सर सर दुआएँ देती रहती है।
    एक रोज़ जो मे लौट रही मुझे अम्मा ना दिखी
    पूरा महोल्ला तलाश आई मैं,
    ना जाने आखिर कहाँ गई?
    जो फिर रोने पिटने की चीख़ें मेरे कानों मे पड़ी
    तोही समझ गई मै :अम्मा अब दुनिया छोड़ चली,
    बेटा बहु रोते थे, मुझे तो लगते उनके अश्रु झूठे थे
    ‘अम्मा तुम क्यों गई ‘
    ‘अम्मा कुछ दिन और क्यों ना रुकी’
    ये बातें जब मुझे सुनने मिली,
    खुद से ही मे लाखों सवाल करने लगी
    क्या ये गम सच्चा है? या नहीं?
    क्या हो रही अब इन सबको ग्लानि बड़ी?
    *कौन जाने क्या सच क्या झूठ*
    ये कहकर मैं आगे सोचने यूँ लगी;
    की क्या मतलब अब इस ग्लानि का?
    अब तो होगई देर बड़ी!
    क्योंकी जीते जी तो वो नर्क भोगी बैठी है
    देखो उस बुढ़िया को जो अपने कष्टों से आखिरी दम तक लड़ती रहती है
    जब कभी गुज़रू उस गली से , दिखती है उसकी परछाई आज भी
    बैठी रहती थी उस खाट पे हाल पूछती सबका
    चाहे हो गर्मी, ठंड या बरसात ही
    उसकी हसी की किलकारी आज भी उन गलियों मे बस्ती हैं
    देखो उस बुढ़िया को जो तारों और खुशियों की नगरी मे सुकून और चैन से रहती है।।।

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