नज़रो में हो कंकड़ तो, रानाई चुभती है.. भरी बज़्म में चस्पा तन्हाई चुभती है.. जिस रिन्द को मयस्सर हो बस कफ़स की फर्श.. उसकी आँखों मे आसमान की ऊंचाई चुभती है.. जो जिस्म सतह […]

मैं जीना चाहती हूँ.. बावजूद इसके.. कि व्यर्थ हो गयी मेरी चीखें.. खुद को बचाने की हर कोशिश.. हर प्रार्थना हर उम्मीद.. जीत गया दानवी पौरुष.. और हार गया मेरा शरीर.. मेरे शरीर का हर […]