Author: Lokesh Nashine

  • मुक्तक

    ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
    इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
    जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
    राहें  भी  रो  पड़ीं  मेरी  तलाश  देखकर

    ©® लोकेश नदीश

  • मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

    मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

    फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से

    आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर

    डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से

    साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा

    दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से

    नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी

    इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से

    कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह

    हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से

    ©® लोकेश नदीश

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