प्रकृति के नगमे गुड़ियों में,
मिली थी एक अनोखी लोड़ी।
सौंधी सूगंध और मंद मुस्कान,
था उसमें प्यार का बोधी।
दिल की गहराई से उठे ध्वनि,
प्रेम की उत्कर्षित सुरीली।
भाषा की सीमाओं को पार कर,
विचारों का नगमा विभावी।
बदलते समय की लहरों में,
एक अद्वितीय पंक्तियों की खेती।
काव्य की मृदु छायाओं से ढंके,
उगे अर्थों के संगीती।
जैसे जीवन की गति में झलके,
न दिखे आज के आदर्शों में।
जैसे शीश में छुपे हैं रहस्य,
न पहचानें मनुष्यों की भीती।
विश्वास और प्रेम की आभा से भरी,
यह कविता अद्वितीय रही।
क्या है इसका सत्य और सृजनशीलता,
मैं भी नहीं पहचान सकी।
