Author: Nishita Bharti 0077

  • है मानव!

    है मानव!

    तुम्हें अंदाजा भी है तुम क्या किए जा रहे हो
    रोज हमें अंत के करीब लिए जा रहे हो
    हे मानव! क्या तुम्हें समझ है,
    क्या तुम्हें पता नहीं प्रकृति पर किसी का जोर नहीं,
    तुम रोज उसका चीरहरण किए जा रहे हो|
    लाखों वन, जीव, जलाशय को प्रदूषित किए जा रहे हो,
    मानव तुम्हें पता है तुम घोर पाप किए जा रहे हो |
    जरूरतों से आगे कुछ मांगना,
    है मानव! क्यों तुम इतना लालच किए जा रहे हो,
    पृथ्वी है कितनी अनमोल क्यों तुम इसे नष्ट किए जा रहे हो |
    यह असंतुलित बहार रोज के चक्रवात अनियमित मौसम में बदलाव और जहरीली वायु, यही तो है अंत के निशान |
    मानव तुम अब तो चिंतन करो क्यों इतना विलंब किए जा रहे हो
    पक्षियों की गूंज या जाम में फंसे वाहन का शोर,
    मानव तुम ही बताओ जा रहे हो किस ओर,
    वक्त रहते हुए बचा सकते हो तुम अनमोल खजाने को,
    हे मानव! ठहरो तो, सोच के जरा देखो तो,
    यह किस भविष्य की ओर जा रहे हो ||

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