Author: poonam prakash

  • parchai

    यूँ तो रोज़ खडी
    होती हु उस सूखे किनारे पर
    तेरा और उस धुप ढलने का इंतज़ार करती हु
    इंतज़ार करती हु मेरी उस परछाई का
    जो धुप ढल जाने के बाद
    कोई दूर देश से घूम के आती हें
    और जोर से थराके लगाकर
    मुझे मुझसे ही जोड़कर
    अगली सुबह उन् धुप की किरणों में मील जाती हें
    घुल जाती हूं उन यादों में
    जिसको रोज़ याद करती हुं
    और फिर दुपहर ढलते ही
    आजाती हु सूखे किनारे पर
    और सुकून की तालाश करती हूं

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