Prakash Pravit, Author at Saavan's Posts

हे भारत ! भारत बनो।

अपनी जो आज़ादी थी, मानो सदियों के सर्द पर, इक नज़र धुप ने ताकी थी। ‘पर’ से तंत्र, ‘स्व’ ने पायी थी, पर ‘संकीर्ण-स्व’ से आजादी बाकी थी। अफ़सोस…! ये हो न सका, और अफ़सोस भी सीमित रहा। आज इंसानियत की असभ्य करवट से आहत, तिरंगे की सिलवटी-सिसक साफ़ है; बस अब तो भारत चाहता है, हल्स्वरूप हर खेत में हल ईमान से उठ जाए। हे भारत! तीन रंगों का एहसास करो, फिर शायद तुम समझोगे,... »