उस रात का फ़ितूर अब भी है
तेरे होठों से पिया था जी भरकर,
जाम-ए-उल्फ़त का नशा अब भी है ।
बहुत खलतीं हैं तुमसे ये अब दूरियाँ
क़रीब आने की वजह अब भी है ।
पास आओ, करो फ़िर वही नादानियाँ
दिल लगाने की इल्तज़ा अब भी है ।
मुझ में फ़िर से बिखर कर समा जाओ तुम
लिपट जाओ मुझसे किसी बेल की तरह
मेरे पहलू में आकर सिमट जाओ तुम
ग़र शौक़-ए-वफ़ा उधर अब भी है ।
Author: Prithi Singh
-
रात का फ़ितूर अब भी है
-
आवारा सा दिल
मैं अकेला ही ख़ुश हूँ, इन राहों में कोई साथ नहीं है
यह तनहा सी शब है, और हाथों में कोई हाथ नहीं है।
न कोई मंज़िल है अपनी, न कोई हमसफ़र मेरा
एक आवारा सा दिल है, और साँसों में कोई नाम नहीं है ।। -
काश कभी गले लगाकर
सोचता हूँ अक्सर
कि तुमको देखे बिना
पता नहीं
कितनी सदियाँ
गुजर गयीं हों जैसे
और तुम
अभी भी बुन रहे होगे
मेरी दुनिया से परे
मेरे लिए
कुछ और इल्ज़ाम
कि जब अचानक
किसी मोड़ पर
मिल गए हम
तो पहना सको मुझे
झट से उन्हें
मेरे कुछ कहने से पहले ही ।
एक छोटी सी
नाराज़गी ही तो थी
या एक पागलपन
जिसे ढो रहे हो अब तक,
काश कभी गले लगाकर
बस एक बार
देख तो लेते…
शायद पिघल कर
लिपट जाता मैं भी
तुमसे
और भूल जाता
अपनी नाराज़गी
और
तेरे हाथों से मिले
वे सारे ग़म। -
आज फिर से
आज फिर से
खिल जाने दो रात
महकती हुई साँसों से भीगी
तेरी हँसी की ख़नक
उतर जाने दो
एक बार फिर से
रूह तक
जैसे गूँज उठती हैं
वादियाँ
पर्वत से उतरती
किसी अलबेली नदी की
कल-कल से
और तृप्त हो जाती है
बरसों से प्यासी
शुष्क धरा
मन्नतों से मिली
किसी
धारा से मिलकर । -
छोटी सी मुलाक़ात
वह छोटी सी मुलाक़ात
विचरती रहती है अक्सर
स्मृतियों में मेरी ।जब सिमट आए थे तुम
मेरी पलकों के दायरे में,
सकुचाते हुए,
छोटे-छोटे कदमों से…
मुस्कुराती हुई कोई बहार
उतर आई हो
किसी वीरान उपवन में जैसे ।सुनो न !
एक बार फिर से भर दो
मन की सूनी टहनियों में वही फूल
तितलियों से एकाकी आकाश
और फ़िज़ाओं में उन्हीं साँसों की महक ।
सदियों तक रहेगा इंतज़ार
कभी फिर से आ जाना
उसी उपवन की देहरी पर,
सकुचाते हुए,
छोटे-छोटे कदमों से चलकर
ऐ बहार !