उस रात का फ़ितूर अब भी है तेरे होठों से पिया था जी भरकर, जाम-ए-उल्फ़त का नशा अब भी है । बहुत खलतीं हैं तुमसे ये अब दूरियाँ क़रीब आने की वजह अब भी है […]

सोचता हूँ अक्सर कि तुमको देखे बिना पता नहीं कितनी सदियाँ गुजर गयीं हों जैसे और तुम अभी भी बुन रहे होगे मेरी दुनिया से परे मेरे लिए कुछ और इल्ज़ाम कि जब अचानक किसी […]

आज फिर से खिल जाने दो रात महकती हुई साँसों से भीगी तेरी हँसी की ख़नक उतर जाने दो एक बार फिर से रूह तक जैसे गूँज उठती हैं वादियाँ पर्वत से उतरती किसी अलबेली […]

वह छोटी सी मुलाक़ात विचरती रहती है अक्सर स्मृतियों में मेरी । जब सिमट आए थे तुम मेरी पलकों के दायरे में, सकुचाते हुए, छोटे-छोटे कदमों से… मुस्कुराती हुई कोई बहार उतर आई हो किसी […]