Author: Priya

  • पापा आपकी बहुत याद आती हैं

    पापा आपकी बहुत याद आती हैं

    आपकी हर बातें याद आती है
    मेरा रूठना आपका मनाना
    मानाने के लिए समझाना
    मुझे रोते देख आपका उदास हो जाना
    जब उन लम्हों का एहसास आता है
    पापा आपका बहुत याद आता है

    इस नासमझ को समझदार बनाना
    अपनी गलतियों से सिखाना
    हाथ पकड़ के खुद से चलाना
    बेहतर एक बेहतर इंसान बनाना
    जब आपका प्रयास याद आता है
    पापा आपका बहुत याद आता है

    ख्वाहिश होती है फिर
    आपका हाथ पकड़ने की
    अपनी गलतियों से सीखने की
    ख्वाहिश होती है फिर रूठने की
    आपकी वही नंदी गुड़िया बनने की

  • सावन

    सावन

    बदलती ऋतुओं से बदल रहा है मन
    देखते इन नजारों को बाबरा हो रहा है तन
    बादलों के टूटने की लड़ी आ रही है
    वह तेज गड़गड़ाहट और चमकता आसमान
    देखने की घड़ी आ रही है
    बेसब्र हो रहा है दिल हमारा
    कब मिलेगा देखने को सावन का
    वह मनभावन दृश्य दोबारा
    लगता है
    वादियों का हो रहा है इशारा
    सूर्य पर भी बादलों का पर्दा छा रहा
    लगता है सावन करीब आ रहा
    बदल रहा है मौसम बदल रहा है नजारा,
    बहुत करीब आ रहा है सावन का सुहावन दृश्य प्यारा|

  • अस्तित्व

    अस्तित्व

    “ख्वाहिश ना ऐसो आराम की,
    चाहत ना दौलतो के शान की,
    जरूरत तो है बस, खुद के पहचान की”
    हर एक के लिए उसका शान
    उसका अस्तित्व और पहचान
    जो कर न सके
    आप के अस्तित्व का सम्मान
    उससे क्या बढ़ेगा आपका मान |
    इसलिए इसका हमेशा रखो ध्यान
    हमारा अस्तित्व ही हमारा सम्मान|

    काव्या- प्रिया सिंह

  • पहचान

    पहचान

    होना था तेरा, पर तेरा होना ही सिर्फ मेरा पहचान नहीं |
    तू था जरूरी, पर एक जरुरी ख्वाब नहीं |
    सिर्फ तेरा होना ही, मेरा समान नहीं |
    ख्वाब मेरे ख्याल कई,
    मकसद और मेरे मुकाम कई |
    अगर अस्तित्ब का पहचान नहीं,
    तो जीवन जीने का मान नहीं |
    “न साथ दिया, न समान किया |
    ये भी कोई, वफ़ा का नाम नहीं |
    हम बेवफा कैसे हुए ?
    अस्तित्ब और ईमान से बढ़ कर कोई शान नहीं |
    जब तक खुद का “पहचान ” नहीं,
    जीवन जीने का कोई मान नहीं |

  • विषय – भारतवर्ष की बेटी

    विषय – भारतवर्ष की बेटी

    ” मन की पीड़ा को आपके सामने ला रही हु अपने वाणी को प्रस्तुत करने जा रही हु ”
    मैं रूकती नहीं उन इरादों से,
    जो कैद कर सके मेरे पाउ ।
    मैं भारत वर्ष की बेटी हूं ,
    मेरे मन में बसते आजादी के भाव।
    अपनी मन की पीड़ा को रख रही हूं,
    रख रही हूं अपने दिल की आशाओं को।
    मन की बात मन से समझ समझीये,
    ऐसे न तोरीयेगा जैसे प तोड़े शिसाओ को।

  • विषय- अब हम रूकेगे नही

    विषय- अब हम रूकेगे नही

    भारतवर्ष की बेटी हूं, समझ गई अपना अधिकार।
    अब चाहोगे भी, तो न देंगे वाणियों को विराम।

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