Author: Rishita Garg

  • Papa ki chaya mein

    अपनी इच्छाओं को दबाते चले गए
    मेरे सपनो को अपना बनाते चले गए
    मुझे कभी अहसास भी नही कराया
    कि वो अपने ख्वाब छुपाते चले गए

    मेरे ख्वाबों को पंख दिए
    उड़ने के नए रंग दिए
    रूठी कभी तो मनाया भी
    नींद न आई तो सुलाया भी

    कठिनाइयों में हाथ कभी छोड़ा नही
    मुश्किलों में साथ कभी तोड़ा नही
    डरी तो गले से लगाया आपने
    मुझे पसंद नही कहके, खिलाया आपने

    मम्मी की डांट से बचाया भी है
    पर अपनी मीठी डांट से समझाया भी है
    डर लगता है आपके आसुओं से
    आखिर कार दुनिया से बचाया भी है

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